एक दिन वह जंगल में घूम रहा था, तभी उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। साधु बहुत शांत और ज्ञानी लग रहे थे। मोहन ने उनसे अपनी परेशानी बताई।
“मैं बहुत मेहनत करता हूँ, लेकिन मुझे कभी पर्याप्त नहीं मिलता,” मोहन ने कहा।
साधु मुस्कुराए और उसे एक थैली में कुछ बीज दिए। उन्होंने कहा, “ये जादुई बीज हैं। अगर तुम इन्हें धैर्य और सही तरीके से लगाओगे, तो ये तुम्हें बहुत लाभ देंगे। लेकिन याद रखना—लालच सब कुछ बर्बाद कर देता है।”
मोहन बहुत खुश हुआ। वह तुरंत घर गया और अपने सबसे अच्छे खेत में बीज बो दिए। कुछ दिनों तक उसने अच्छे से पानी दिया और देखभाल की। धीरे-धीरे पौधे उगने लगे।
लेकिन मोहन अधीर हो गया। उसने सोचा, “ये इतने धीरे क्यों बढ़ रहे हैं? अगर मैं ज्यादा पानी और खाद डालूँ, तो ये जल्दी बढ़ेंगे।”
उसने पौधों में जरूरत से ज्यादा पानी और खाद डालना शुरू कर दिया। कुछ ही दिनों में पौधे कमजोर होने लगे।
फिर भी मोहन को संतोष नहीं हुआ। उसने सोचा, “अगर मैं इन्हें खोदकर देखूँ कि ये कितने बड़े हुए हैं?” वह बार-बार पौधों को उखाड़कर देखने लगा।
परिणाम वही हुआ जो होना था—सभी पौधे सूख गए और नष्ट हो गए।
मोहन बहुत दुखी हुआ और वापस साधु के पास गया। उसने शिकायत की, “आपके बीज काम नहीं कर रहे।”
साधु ने शांत स्वर में कहा, “बीज सही थे, लेकिन तुम्हारा लालच और अधीरता गलत थी। अच्छी चीजें समय लेती हैं, और सफलता उन्हीं को मिलती है जो धैर्य रखते हैं।”
मोहन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने समझ लिया कि जल्दी सफलता पाने की उसकी इच्छा ने सब कुछ बर्बाद कर दिया।
उस दिन के बाद मोहन बदल गया। उसने धैर्य और मेहनत के साथ काम करना शुरू किया और धीरे-धीरे उसका जीवन सफल हो गया।
